By आदिवासी युवा
गढ़वा. गरीब-गुरबों के कल्याण के लिए सरकार के स्तर पर दर्जनों योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इससे देश में सबसे गरीब तबके के बजाय किसी और का कल्याण होता प्रतीत होता है.
ऐसा हम नहीं कह रहे, बल्कि झारखंड के गढ़वा जिले के आदिवासी परिवार की बेबसी भ्रष्टतंत्र और लूटतंत्र के क्रूर चेहरे को उजागर कर रहा है. जिले के रंका प्रखंड के आदिवासी बहुल सिरोइकला पंचायत में सरकार की कोई योजना नहीं पहुंच रही है. सरकार की ओर से मिलने वाला मुफ्त अनाज भी यहां के लोगों की पहुंच से दूर है. लिहाजा, खुद को जिंदा रखने के लिए लोग कंद-मूल और गेठी खाने को मजबूर हैं.
बताया जाता है कि दशहरा पूजा से पहले 4 महीने के बकाया राशन में से 1 महीने का राशन मिला, लेकिन यह आदिवासी परिवार का पेट भरने के लिए नाकाफी है. सिरोइकला का टिकर चुइया टोला आदिवासी बहुल इलाका है. कहने को तो झारखंड में आदिवासी हितों को ध्यान में रखने वाली सरकार बनी है, लेकिन इस गांव की हालत देखकर इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां के लोग अपना गुजर-बसर कैसे करते होंगे. यहां जंगलों में वास करने वाला कोरवा समुदाय रहता है. इस इलाके में घर तक जाने के लिए न पुल है और न ही सड़क. खाने के लिए न तो राशन है और न ही रहने के लिए पक्का मकान.
ऐसे में इस पथरीली इलाके में लोग कैसे जीवन बसर करते हैं, इसका बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है. अब तो रहने के भी लाले जंगल में रहने वाले आदिवासियों की जमीन पर वन विभाग ने ट्रेंच गाड़ रखा है, जिससे उनके सामने अब रहने को भी लाले पड़ गए हैं.
इन आदिवासियों को अब तक न तो आवास मिला है और नही पीने के लिए शुद्ध पानी की व्यवस्था हो सकी है. हां, केंद्र सरकार की शौचालय योजना की पहुंच इस गांव में जरूर देखी गई.
चार महीना का राशन बकाया है, लेकिन आदिवासी परिवारों को सिर्फ 1 महीने का ही राशन मिला. ऐसे में खुद को जिंदा रखने के लिए लोग जंगली कंद-मूल खाने को मजबूर हैं.
आदिवासी परिवार पूरी तरह से जंगल पर आश्रित हुए पिछले 4 माह से इन आदिवासी परिवारों को राशन नहीं मिला है. जब हो-हंगामा हुआ तो दशहरा पूजा से पहले 1 महीने का राशन दिया गया, लेकिन इतना अनाज ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता है.
अनाज खत्म होने पर आदिवासी परिवार पूरी तरह जंगल पर आश्रित हो गया है. लोग जंगलों से कंद-मूल और गेठी लाकर खा रहे हैं. ग्रामीण कहते हैं कि हमलोगों को देखने-सुनने वाला कोई नहीं है. हमलोगों की जमीन छीनी जा रही है और सरकार की योजना का लाभ भी नहीं मिल रहा है.
दो महीने से सिस्टम गड़बड़ाया हुआ है:बीडीओ इस मामले पर इलाके के बीडीओ ने बताया कि अभी चावल नहीं आ रहा है. दो-तीन महीने से मामला गड़बड़ाया हुआ है. बीडीओ ने प्रभावित परिवारों को तुरंत प्रति व्यक्ति पांच-पांच किलो चावल देने की बात कही है. उन्होंने कहा कि आदिवासी परिवारों को और मदद मिल सके, इसके लिए जिला मुख्यालय को रिपोर्ट दी जाएगी.

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जय आदिवासी
जय जोहार