By आदिवासी युवा
पिछले एक दशक से लगातार सरगुजा और कोरबा जिलों में स्थित हसदेव अरण्य को बचाने के लिए वहां पर निवासरत गोंड़, उरांव, पंडो और कंवर आदिवासी समुदाय के लोग संघर्षरत हैं।
ग्राम सभाओं के अधिकारों के हनन के खिलाफ न्याय की गुहार लगाने के लिए दस दिन में 300 किलोमीटर चलकर रायपुर पहुंचे आदिवासियों ने गुरुवार को राजधानी की सड़कों पर रैली निकाली।
हसदेव बचाओ पदयात्रा में शामिल अधिकतर युवा आदिवासियों के चेहरे पर भले ही थकान दिखाई दे रही थी, लेकिन जल, जंगल और जमीन को बचाने का जोश बरकरार था।
आदिवासी छात्र-छात्राओं से बातचीत की तो उनका कहना था कि हसदेव अरण्य क्षेत्र को बचाने के लिए अगर जान भी चली जाए तो वे इसके लिए भी तैयार हैं। कोयले का खदान किसी भी कीमत पर खुलने नहीं देंगे। कोयला खदान खुलने से जंगल के जीवन का आधार ही खत्म हो जाएगा।
मदनपुर गांव की संगीता सत्या आडिल ने कहा कि चार अक्टूबर से मेरे गांव के अलावा आसपास के दर्जन भर से अधिक गांवों के बड़े बुजुर्ग, महिलाएं, छात्र-छात्राएं आदि पदयात्रा करके रायपुर में शासन के सामने अपनी मांग रखने आए हैं। गांव वालों की मर्जी के बगैर भला कैसे कोयला खदान खुल सकती है
फतेपुर गांव की बसंती दीवान का कहना था कि हसदेव अरण्य क्षेत्र में जबरदस्ती खोली जा रहीं कोयला खनन परियोजनाओं का हम सालों से विरोध करते आ रहे हैं। कोयला खदान खुलने से जंगल तो नष्ट होंगे ही, वायु और जल प्रदूषित हो जाएगा। आदिवासियों के जीवन का यही तो आधार है।
पतुरिया डांड गांव की सुनीता श्याम ने कहा कि कोयला खनन होने से आसपास के तीस से चालीस गांव प्रभावित होंगे। इन गांवों को बचाने के लिए हम सभी रायपुर आए हैं। सरकार को हमारी जायज मांगों को मानना ही पड़ेगा। किसी भी कीमत पर गांवों में कोयला खदान नहीं खुलने देंगे।
श्यामपारा (तारा) गांव की चमेली सिंह पोर्ते ने कहा कि आदिवासियों के जीवन का आधार ही जल, जंगल और जमीन है। अगर यहीं बर्बाद हो जाएंगे तो हम लोग कैसे जी पाएंगे। इसे बचाने के लिए रायपुर में अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने आए हैं। इसी गांव की पुष्पलता आडिल ने कहा कि चार अक्टूबर से लगातार पदयात्रा करके यहां आए हैं। कोयला खदान न खुले, इसका आदेश सरकार को करना ही पड़ेगा।
सरगुजा जिले के हरिहरपुर (तारा) गांव के बालसाय कोर्राम ने कहा कि परसा कोल खदान को सरकार तत्काल रद करे। अन्य खदानों के खुलने से भी जल, जंगल और जमीन बर्बाद हो जाएगा। ग्राम सभा में फर्जी तरीके से कोयला खदान खोलने का प्रस्ताव पारित किया गया है। हम लोग अपनी आजीविका और संस्कृति को बचाने हर संभव प्रयास कर रहे हैं, परंतु इन सब प्रयासों और भारी जनविरोध के बावजूद सभी प्रक्रियाओं की धज्जियां उड़ाकर के आदिवासी समुदाय के लिए बनी पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून 1996 तथा वनाधिकार मान्यता कानून 2006 आदि को नरअंदाज कर लगातार खनन परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है।
स्थानीय प्रशासन की भूमिका अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। सारे विरोध को कुचल कर गैरकानूनी रूप से खनन परियोजनाओं को कीशुरू करने कोशिश की जा रही है।

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