By आदिवासी युवा (adiwasiyuva.com)
आपकी जय !
आज से लगभग 28 साल पहले आदिवासी समाज के दूरदृष्टि कार्यकर्ताओं ने "आदिवासी एकता परिषद" का गठन किया और 1994 में पहली बार महाराष्ट्र राज्य के अंकुश विहिर, वर्तमान नंदुरबार जिले (महाराष्ट्र) में आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन का आयोजन किया गया तब से लेकर अभी तक यह महासम्मेलन निरंतर रूप से होते आ रहा है । इस महासम्मेलन को करने के लिए एक विशेष तिथि 14 जनवरी का चयन किया गया इसका भी बड़ा महत्व है । इस दिन से ही पृथ्वी अपनी परिक्रमा की दिशा बदल लेती है और आदिवासी एकता परिषद ने भी दुनिया की सोच को बदलने का संकल्प लिया है ।
दुनिया में आदिवासियत की स्थापना कर इंसानियत,सह अस्तित्व, सहचर्य, ममता, विनम्रता, समानता, बंधुता स्वतंत्रता, सामूहिकता, प्रेम, संवेदना, प्रकृति के साथ संबद्धता आदि मूल मानवीय मूल्यों की पुनः स्थापना करने के उद्देश्य से आदिवासी एकता परिषद द्वारा यह वैचारिक आंदोलन निरंतर रूप से चलाया जा रहा रहा है ।
शुरुआत के समय में बहुत कम साथियों ने मिलकर इसकी शुरुआत की गई थी, किंतु आज इस वैचारिक आंदोलन के साथ लाखों लोग एवं सैकड़ों सामाजिक संगठन व संस्थाएं जुड़ गई हैं । आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन शुरुआती दौर में चार राज्य महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में चक्रीय क्रम में होते आया है । कुछ समय बाद इसके साथ एक केंद्र शासित राज्य दादरा नगर हवेली भी जुड़ गया है । इस प्रकार अब यह पश्चिम भारत के पांच राज्य में होता है, किंतु इस महासम्मेलन में भारत देश के अन्य राज्यों के लोग भी शामिल होते हैं ।
साल भर अपने अपने इलाके में कार्यरत स्थानीय संगठनों व संस्थाओं के बैनर तले अपने अपने स्थानीय मुद्दों को लेकर करते है और 14 जनवरी को पूरे देश भर के कार्यकर्ता एक ही स्थान पर मिलकर सामाजिक चिंतन करते हैं एवं अपनी सार्वभौमिक संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं । कालांतर में यह प्रोग्राम 2 दिन का होने लगा अर्थात 14 व 15 जनवरी, प्रथम दिवस आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन का उद्घाटन होता है और अलग अलग राज्य से आए हुए कार्यकर्ताओं द्वारा पूरे साल भर की गतिविधियों को साझा करते हैं एवं आगामी रणनीति हेतु अपने सुझाव देते हैं ।
आदिवासी समाज के लेखकों द्वारा तैयार किया गये आदिवासी समाज पर आधारित अच्छे साहित्य का विमोचन भी इस महासम्मेलन के मंच से किया जाता है । 14 जनवरी को शाम के समय देश भर से आए हुए आदिवासी समाज के सांस्कृतिक दलों द्वारा अपनी मनमोहक प्रस्तुतियां प्रस्तुत की जाती है । 15 जनवरी को संगठन सत्र का आयोजन किया जाता है । जिसमें आने वाले वर्ष के लिए साल भर की कार्य योजनाएं बनाई जाती है । उसी कार्य योजना पर साल भर कार्यकर्ताओं द्वारा अपने अपने इलाके में स्थानीय संगठनों के माध्यम से जन जागरण का कार्य किया जाता है । प्रत्येक महासम्मेलन में एक थीम निर्धारित की जाती है । यह थीम समसामयिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है । इस थीम पर भी कार्यकर्ता द्वारा साल पर कार्य किया जाता है ।
आदिवासी एकता परिषद की विचारधारा एवं महासम्मेलन से लाखों लोगों के जुड़ाव को देखते हुए वर्ष 2016 में हुए राजपिपला महासम्मेलन से एक और दिन 13 जनवरी को अतिरिक्त जोड़ा गया । इस प्रकार अब यह सम्मेलन तीन दिवसीय होने लगा है । 13 जनवरी को महिला, युवा एवं साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया जाता है । 13 जनवरी को ही आदिवासी परंपरा व जीवन मूल्यों पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया जाता है । जिसमें आदिवासी समाज के दैनंदिनी जीवन में काम आने वाली वस्तुओं से लेकर अनाज, आत्म रक्षा के शस्त्र एवं आस्था व श्रृद्धा से जुड़ी हुई चीजों को रखा जाता है । महासम्मेलन में लगने वाले पंडाल के चारों ओर अलग अलग राज्य के आदिवासी समुदाय के साहित्य, वस्तुएं व स्वादिष्ट व्यंजन आदि के स्टॉल भी लगाए जाते हैं । आप अपनी पसंद की वस्तुएं खरीद सकते हैं एवं व्यंजनों का भी आनंद ले सकते हैं ।
आदिवासी समाज के लोगों को इस तीन दिवसीय महासम्मेलन का बेसब्री से इंतजार रहता है । महासम्मेलन को लेकर बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी लोग उत्साहित रहते हैं । इतने विशाल आयोजन का नियोजन भी कार्यकर्ता आपस मिलजुल कर आपसी तालमेल से ही करते हैं । इसमें लगने वाले खर्च का नियोजन भी कार्यकर्ता स्वयं लोगों के घर घर जाकर आर्थिक सहयोग एवं अनाज एकत्रित कर करते हैं ।
यह वैचारिक आंदोलन एवं महासम्मेलन राजनीतिक व धार्मिक विचारधाराओं से ऊपर उठकर किया जाता है । इसमें सभी राजनीतिक एवं धार्मिक विचारधाराओं के लोग शामिल होते हैं और आदिवासी समाज के सभी वर्गों के लोग जिसमें मजदूर, किसान, शासकीय सेवक, व्यापारी आदि सभी शामिल होते हैं । इसीलिए आदिवासी एकता परिषद के इस आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन के मंच से राजनीतिक एवं धार्मिक बातें रखने से कार्यकर्ताओं को परहेज रखने के लिए कहा जाता है । फिर भी यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार की बातें इस मंच से करता है तो वह आदिवासी एकता परिषद की बात नहीं मानी जाती है ।
यह महासम्मेलन जिस भी राज्य में होता है । उस राज्य के कार्यकर्ता महासम्मेलन की घोषणा के बाद से ही इसकी तैयारियां चालू कर देते हैं । आखिर के दो-तीन महीने में तो कुछ कार्यकर्ता अपने सारे कार्य छोड़कर महासम्मेलन की तैयारी में लग जाते हैं । कुछ कर्मचारी साथी 15 दिन - एक महीने की छुट्टियां लेकर इस कार्य में लग जाते हैं । जिस भी इलाके में यह महासम्मेलन होता है उस इलाक़े कार्यकर्ताओं व्यावहारिक रूप से प्रशिक्षित होकर तैयार हो जाते हैं और हमेशा के लिए इस वैचारिक आंदोलन के साथ छोड़ जाते हैं ।
इस वैचारिक आंदोलन एवं महासम्मेलन के माध्यम से भारत देश में आदिवासियों की एक मजबूत ताकत खड़ी हो रही है और सभी क्षेत्र में नेतृत्व करने हेतु सक्षम नेतृत्व तैयार हो रहा है । पिछले कुछ समय से भारत देश के अतिरिक्त अन्य देशों के आदिवासी समाज के कार्यकर्ता भी इस महासम्मेलन में भाग लेने लगे हैं । आदिवासी समाज के अच्छे कार्यकर्ताओं को इतने सालों से जोड़ कर रखना एवं निरंतर कार्यक्रम करना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है । फिर भी हमारे वरिष्ठ कार्यकर्ताओें ने इसे बखूबी स्वीकार करते हुए निभाते आ रहे हैं ।
अब इस वैचारिक आंदोलन को आगे बढ़ाने की जवाबदारी समाज के युवा साथियों की है । वर्तमान हालात में देश दुनिया में आदिवासियों की गंभीर स्थिति को देखते हुए हमारे समाज के नौजवान साथियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है । इस वैचारिक आंदोलन से ना सिर्फ आदिवासी समाज को फायदा होने वाला है, बल्कि पूरी दुनिया को इसका लाभ मिलने वाला है ।
आदिवासी समाज की परंपराएं, संस्कृति, जीवन मूल्य दर्शन व अध्यात्म सार्वभौमिक एवं सर्वहिताएं होने साथ ही प्रकृति के भी हित में है और इसे बचाने का कार्य आदिवासी एकता परिषद कर रही है । अतः इसे संभाल कर आगे बढ़ाने की जवाबदारी गैर आदिवासी समाज की भी है । इसे हाल ही के समय में पूरी दुनिया में फैली कोरोना जैसी विध्वंसक महामारी ने भी सिद्ध कर दिया है । अतः दुनिया के सभी लोगों से अपील है कि आप सभी अपने मूल की ओर लौट आओ, इसी में हम सब की भलाई है ।
इस साल का 29 वां आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन, 13- 14 -15 जनवरी, 2022 को प्रतापगढ़ राजस्थान में होने जा रहा है । जिसमें आदिवासी समाज के लाखों लोग शामिल होंगे । इसे सफल बनाने हेतु सभी लोग तन मन धन से सहयोग कीजिए।
-आदिवासी एकता परिषद
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