आदिवासी युवा (adiwasiyuva.com)
विषय: भारत में आदिवासीयो का आत्मसन्मान आंदोलन और मानव मुक्ती कि लढाई ...
भाग 2
प्रथमता आदिवासी कौन है? इसकी निश्चित व्याख्या क्या है? इसके बारे मे हमे सोचना चाहिए। क्यों कि कौन से मानव समुह को क्या नाम दिया जाना चाहिये यह पहले से सत्ताधारी वर्ग एवं राजकिय नेतृत्व तय करता है। उस समुह के बारे में सोचने कि राज्यकर्ताओ ने कभी भी जरूरत नही समजा।
उस मानव समुह से हम किस तरह से फायदा उठा सकते है। इसी सोच से उन्होंने अपने हिसाब से उस समुह को हमेशा से नाम देने का प्रयास हुआ है।
अंग्रेजो ने जनगणना करते समय 1871 से 1941 तक जिव वादी जमात, प्रकृतीवादी जमात, पशुपालक जमात, पहाडि-जमात, प्राचिन जमात, गुन्हगार जमात ऐसे शब्द जनगणना करते समय इस्तेमाल किये है। और आजाद भारत मै आज गिरिजन, वनवासी जैसे अपमानित करने वाले शब्द बोले जाते है। आदिवासी शब्द के बारे मे चित्रविचित्र भावना दिखती है।
क्योंकि यह शब्द हम आदिवासी यों का धरती से सीधा संबंध दर्शाता है। इस के बारे में दुनियाने किसी पर्याय के बारे में सोचा है क्या? और सोचा है तो क्या वो पर्याय भारत सरकार के दृष्टिकोन से अलग है। यह सवाल सामने आते है।
भारत सरकार के संयुक्त राष्ट्र संघ में शामील शिष्टमण्डल को वर्ल्ड कौन्सिल ऑफ इंडिजिनस पिपल (आदिवासी यो का जागतिक मंडल) एक गैर-सरकारी राष्ट्रसंघ के अंतर्गत अधिकृत संस्था के तरफ से भारत के आदिवासियों के बारे मे पुछे जानेपर "भारत मे आदिवासी जन समुह अस्तित्व मे नही हैं, और जो थे वह दुसरे समुह में विलिन हो गये, ऐसा भारत सरकार के तरफ से कहा गया है।
इस बात का पता चलने पर 7 ऑगस्ट 1987 में आदिवासी एकता परिषद के शीर्षस्थ कार्यकर्ता और (ICITP) इस आदिवासी संघटन के प्रोफेसर किस्कू डाॅ. निर्मल मिज और आसाम से समर ब्रम्ह चौधरी इन्होंने जिनिव्हा जाकर संयुक्त राष्ट्र संघ को भारत मे रहने वाले आदिवासी यों कि अस्तित्व कि बात रखी।
संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यकारी समुहने 7 सत्रो के माध्यम से आदिवासी प्रतिनिधियों के उपस्थिती मे आदिवासी यों के चार लक्षणो को मान्यता दिए
- (1) दुनिया के किसि भी भाग मे सबसे पहले बसा मानवसमूह
- (2) वर्चस्व वादी नही है ऐसा
- (3) सजिव सृष्टि से एकरूप होने वाला, सांस्कॄतिक दृष्टीसे अलग है ऐसा
- 4) खुदको आदिवासी के नाम से पहचानने वाले मानव वंश के सदस्य
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जय आदिवासी
जय जोहार