"आदिवासी बोलने लगा, आदिवासी एकता परिषद एक वैचारिक आंदोलन "

 आदिवासी युवा (adiwasiyuva.com)


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आदिवासी एकता परिषद 
आप. सुनिल गायकवाड 
राज्यसंपर्क प्रमुख महाराष्ट्र 
9843698289


विषय: भारत में आदिवासीयो का आत्मसम्मान का आंदोलन और मानव मुक्ति कि लढाई ...

भाग 3

आदिवासियो का देश मे उत्पिडन, अन्याय, अत्याचार, हिंदुकरण, ख्रिश्चिनिकरण, विकास के नाम पर विस्थापित करना, शिक्षा मे खासगीकरण, संस्कृती पर आक्रमण  जैसे ज्वलंत समस्याएं से आज पुरा समाज संघर्ष कर रहा है।


हमारे समाज के  लोगो के आत्मसम्मान के बारे मे हमे सोचना होगा, तज्ञ लोगो के दृष्टीसे अंदोलन कि व्याख्या " प्रस्थापित संबध, और संस्थात्मक मुल्यों मे बदलाव लाने हेतु से, समर्पण कि भावना से चलने वाले सामूहिक प्रयास को अंदोलन कहते है और ऐसा प्रयास हमने किया है का? यह भी सवाल सामने आता है। 


आदिवासी समाज वर्चस्ववादी नही है।आज भी वह जुल्म, छल और दबाव का शिकार है। राजकीय और आर्थिक व्यवस्था में आदिवासियों को समाविष्ट नही किया गया है। और हमे क्षितिज पर आने से रोक दिया है। इस लिए  आदिवासी द्वारा चलाया जा रहा अंदोलन जादा प्रभावित करने वाला नही लग रहा है तो आश्चर्य की कोई बात नही। 


इतिहास विदित है। अॅमेझाॅन, ब्राजिल, के आदिवासी जमातीयोंको सुसंस्कृत करने के नाम पर नष्ट कर दिया गया है। उस हिसाब से भारत मे होनेवाला निम्नस्तरीय पर का भयानक शोषण, दबाव, और सांस्कृतिक आक्रमनोसे गुजरते हुए,अपनी भाषा, संस्कृती, जिवन पध्दति, कला, संगीत, नृत्य, रिति भाति को बरकरार रखने को बरकरार रखने के लिये आदिवासियों के वंशजो को जो संघर्ष करना पडा है। वह इतिहास हम आदिवासीयों का सर गर्व से उचा करने वाला है। उसकी वजह से ही भारत मे हमारा अस्तित्व टिका हुवा है। और यही हमारा आत्मसम्मान का अंदोलन है।


आदिवासी समाज समतावादी, सह- अस्तित्व पर विश्वास रखने वाला समाज है। लेकिन जब जब हमारे परंपरागत अधिकारों पर आक्रमण हुए, परंपरागत जीवन पध्दती नष्ट होने के आसार दिखे तब तब आदिवासीयों ने सत्ताधारियों के प्रयास असफल किये है और उनको बहादुरी से जवाब दिया है।


मध्ये भारत मे भिल बहादुरो ने सन 1818 से 1858 तक इंदौर से नांदुर, बागलाण से बुरहानपुर, श्रीरामपुर से सुल्तानपुर तक भागों मे 40 सालो तक अंग्रेजो के जुलमी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र लढाई की है। भारत के स्वतंत्रता के लढाई मे 11 एफ्रिल 1958 को अंबापानी कि लढाई मे बंदी बनाये गये 57 भिल बहादुरो ने ढोल कि आवाजपर बंदुक कि गोलिया सिनेपर खाकर बलिदान का पहला सम्मान प्राप्त किया है। 


बलिदान मैं महिलाओ का भी महत्वपुर्ण योगदान रहा है। उस समय 400 महिलाएं को बंदी बनाने कि सरकारी दफ्तर मे नोंद की गयी है। उस अंदोलन ने अंग्रेजो की हुकुमत के जड को हिला दिया था यह गौरवशाली इतिहास हमारा सर गर्व से उचा कर देता है, जब देश के राजा महाराजाओ ने अंग्रेजो के गुलामी स्वीकार कर ली थी तब आदिवासी यों ने ही स्वतंत्रता की लढाई लढकर एक नया इतिहास रचा है पर यह इतिहास दुनिया से छुपाया गया, यही अंदोलन से अंग्रेजो ने आदिवासियो के साथ समझोता किया और 1874 मे सिड्युल डिस्ट्रिक्ट अँक्ट (अनुसूचित जिला अधिनियम) मतलब "हमारे गाव में हमारा राज पारित कर के मुंडा, मानकी पंरपरा, भिलपंच परंपरा, भाऊबंद की पंरपरा, जल, जमीन, जंगल कि पंरपरा एवं पारंपरिक अधिकारो का कानून पारित करके सेल्फ गर्वनेंस का अधिकार बहाल किये थे। यही अधिकार संविधान मे 5 वी और 6 टी अनुसूचि मे दिये गये है।


जोहार
जय आदिवासी
आप की जय 
आदिवासी एकता परिषद 
आप. सुनिल गायकवाड
राज्यसंपर्क प्रमुख महाराष्ट्र 

9843698289


"आदिवासी बोलने लगा, आदिवासी एकता परिषद एक वैचारिक आंदोलन "

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